Tum sahi thi.......
<>कोई किसी के वैसे ही करीब नहीं आ जाता है
नहीं तो जिंदिगी मै लोग वैसे भी बहुत मिलते है
किसी को समझ पाना और उसे समझ आना
दोनों ही जरुरी है......
फिर जब मैंने तुम्हे देखा था
तब सिर्फ एहि न था मैं तभी तुम्हे लाइक करने लगा था |
नहीं , जब तुम से बातें हुई तुम्हारे और नजदीक आया :
तब शायद तुम्हारे करीब आया
और ये नजदीकियां दोनों तरफ से बढ़ती जाती है
किसी के लिए वो महज़ नज़दीकया ही रहा जाती है
और किसी के लिए वो दूरिया बन जाती है ...
दूरिया जो दिल से बनाने लगती है
जो सायद कम हीं होती ...
जो हमे तब मसहूस होती है
जब नजदीकया कम होने लगती है
और बात तो सही है ही......
कोई चीज बस अपनी हद तक खींची जा सकती है
उसके बाद उसको बढ़ाने की कोशिश करोगे
तो wo पहले जैसे नहीं रहेगी
इसीलिए मैं भी यही रुक जाता हूं
क्योंकि अब तुम भी रुक जाना चाहती हो
अगर जो इसके आगे बढूंगा तो शायद तुमको भी अच्छा ना लगे
एक वक्त आएगा जब चीजें हद से बाहर हो जाएंगी
और मैंने तुम्हें वैसे ही पसंद किया है जैसे तुम हो.
तो जाहिर सी बात है मुझे तुम्हारा अलग बर्ताव अच्छा नहीं लगेगा
तो इसको नहीं रहने देते हैं
तुम सही हो....
कितने लोगों को देखते हैं
मार्केट में मेट्रो में मॉल में सड़कों पर
सबके हमारी तरह अपने अपने फ्रेंड है
मतलब सब किसी ना किसी के करीब हैं
एक होता है ना फर्क पड़ना
ए फर्क हमें बहुत कम लोगों के लिए ही पड़ता है जिंदगी में
जो करीब आ जाते हैं हमारे सफर में..
किसी का बुरा फील करना अलग है और फर्क पड़ना अलग
दोनों एक दूसरे से अलग है..
फिर बस एक वक्त एक वक्त के लिए होता है
और फर्क उससे भी थोड़ा ज्यादा गहरा
हां मुझे फर्क पड़ता है हर उस बात से से बात से से जिससे तुम्हें फर्क पड़ता है
फिर चाहे वह कमियां मुझ में ही क्यों ना हो
क्योंकि मैंने तुम्हें वैसे वैसे ही पसंद किया था जैसे तुम हो
कल तुम्हारा तारीफ करना मुझे अच्छा लगा था
तो आज दूर जाना ,रुक जाना, ए भी सही है
कभी कभी रुकना भी जरूरी होता है
हर दफा आगे बढ़ना भी जरूरी नहीं.
पीछे चीजें अधूरी रह जाती हैं
आगे बढ़ने की रफ्तार में
हम अक्सर अपने कीमती पलों को खो देते हैं
जो जिंदगी में फिर कभी लौट कर नहीं आती..
और मैं रुका हूं और चाहता हूं वह Rastha तुम तय करके मेरे करीब वापस आ जाओ....
जिसकी वजह से हम से कुछ दूरियां बन गई
Wo दूरियां भी तय करना जरूरी है
इसलिए मैं रुका हूं
शायद सब ठीक हो जाए.........
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